Shree Yantra

श्री यन्त्र:

यह सर्वाधिक लोकप्रिय यन्त्र है । इसकी अधिष्ठता देवी त्रिपुर सुन्दरी से भी अधिक इस यन्त्र की मान्यता है। यह् बेहद शक्तिशाली ललिता देवी का पूजा चक्र है । इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों को सम्मोहन करने वाला भी कहते है। यह सर्व रक्षाकार, सर्वव्याधिनिवारक, सर्वकष्ट्नाशाक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद, सर्वार्थ-साधक, सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल, दुध से स्वच्छ करके पूजा पूरब की ओर मुंह करके की जाती है। श्रीयन्त्र का सीधा मतलब है लक्ष्मी प्राप्ति का यन्त्र ।

श्री यंत्र से होने वाले लाभ:

श्री यंत्र प्रमुख रूप से ऐश्वर्य तथा समृद्धि प्रदान करने वाली महाविद्या त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी का सिद्ध यंत्र है. यह यंत्र सही अर्थों में यंत्रराज है. इस यंत्र को स्थापित करने का तात्पर्य श्री को अपने संपूर्ण ऐश्वर्य के साथ आमंत्रित करना होता है. कहा गया है कि :-

श्री सुंदरी साधन तत्पराणाम्‌ , भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव….

अर्थात जो साधक श्री यंत्र के माध्यम से त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी की साधना के लिए प्रयासरत होता है, उसके एक हाथ में सभी प्रकार के भोग होते हैं, तथा दूसरे हाथ में पूर्ण मोक्ष होता है. आशय यह कि श्री यंत्र का साधक समस्त प्रकार के भोगों का उपभोग करता हुआ अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है. इस प्रकार यह एकमात्र ऐसी साधना है जो एक साथ भोग तथा मोक्ष दोनों ही प्रदान करती है, इसलिए प्रत्येक साधक इस साधना को प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है। इस अद्भुत यंत्र से अनेक लाभ हैं, इनमें प्रमुख हैं :-

श्री चक्र के पादोदक-पान से भी सहस्त्र कोटि तीर्थों में स्नान का फल प्राप्त होता है।

‘तीर्थस्नान सहस्त्र कोटि फलद्र श्री चक्रपादोदकम’।

श्री यंत्र के स्थापन मात्र से भगवती लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है.

कार्यस्थल पर इसका नित्य पूजन व्यापार में विकास देता है.

घर पर इसका नित्य पूजन करने से संपूर्ण दांपत्य सुख प्राप्त होता है.

पूरे विधि विधान से इसका पूजन यदि प्रत्येक दीपावली की रात्रि को संपन्न कर लिया जाय तो उस घर में साल भर किसी प्रकार की कमी नही होती है.

श्री यंत्र पर ध्यान लगाने से मानसिक क्षमता में वृद्धि होती है. उच्च यौगिक दशा में यह सहस्रार चक्र के भेदन में सहायक माना गया है.

यह विविध वास्तु दोषों के निराकरण के लिए श्रेष्ठतम उपाय है.

निर्माण : आगम शास्त्र के अनुसार यन्त्र देवता का स्थूल देह है। ‘श्रीचक्रं शिवयोर्वपुः’ – श्री यन्त्र शिव-शिवा के रूप में व्यक्त हुआ। सृष्टि निर्माण के लिए उस परमशक्ति में स्फुरण हुआ सव्रप्रथम श्रीयन्त्र का आविर्भाव हुआ-
यदा सा परमाशक्तिः स्वेच्छता विश्‍वरूपिणी।
स्फुरतामात्मनः पश्येन्तदा चक्रस्य सम्भवः।।
(नित्याषोडशिकार्णव)
‘बिन्दु, त्रिकोण, अष्टकोण, अन्तर्दर्शार, बहिर्दशार, चतुर्दशार, अष्ट दल, षोडशदल, वृत्तत्रय, भूपुर – इन नवयोन्तात्मक समस्त ब्रह्याण्ड का नियामक रेखात्मक श्री यन्त्र का प्रादुर्भाव हुआ।’
इसके मध्य भाग में बिन्दु व छोटे-बङे मुख्य नौ त्रिकोण से बने 43, दो कमल दल, भूपुर, एक चतुरस 43 त्रिकोणों से निर्मित उन्न्त श्रृंग के सदृश्य मेरु पृष्ठीय श्रीयन्त्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों, का प्रजनन केन्द्र बिन्दु कहा गया है।
सर्वप्रथम बिन्दु के तीन रूप हुये- धर्म, अधर्म, चार आत्मा, मातृ-मेय और प्रभा त्रिपुटी। धर्म और अधर्म दो, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा चार, मातृ, मेय, प्रभा ये तीन इस प्रकार कुल नौ हुए।
त्रिकोण और अष्टकोण यही नव योन्यात्मक श्री चक्र हैं। शेष सब कोणों और दलों का समावेश नौ योनियों में हो जाता है। इस प्रकार श्री चक्र नवयोन्यात्मक श्री चक्र 42 कोणों और 9 आवरणों वाला बन जाता है।

इसके चक्रेश्‍वरियों का विवरण इस प्रकार है-

पू० आवरण देवता चक का नाम चक्रेश्वरी
1 बिन्दु सर्वानन्दमय ललिता महात्रिपुर सुनदरी
3 त्रिकोण सर्व सिद्धि त्रिपुराम्बा
8 अष्टाकोण सर्वरोग हर त्रिपुरा सिद्धा
10 अन्तर्दशार सर्वरक्षाकर त्रिपुरा मालिनी
10 बहिर्दशार सर्वार्थ साधक त्रिपुरा श्री
14 चतुर्दशार सर्व सौभा-ग्यदायक त्रिपुरवासिनी
8 अष्ट दल सर्वसंक्षोभण त्रिपुर सुन्दरी
16 षोडशदल सर्वशा परिपूरक त्रिपुरेशी
28 भूपुर त्रैलोक्य मोहन त्रिपुरा

श्री विद्या-सिद्धि के लिए इसी श्री यन्त्र की परम्परा के श्रीगुरू से दीक्षा लेकर अर्चना की जाती है। इसमें मुख्य रूप से उपरोक्त 98 शक्तियों का अर्चन हो जाता है। ये ही शक्तियां सम्पूर्ण ब्रह्याण्ड को नियंत्रित करती हैं। वस्तुतः श्री यन्त्र और ब्रह्याण्ड का तादात्म्य है। श्री यन्त्र का अर्चक इन शक्तियों का अर्चनकर पहले अपने शरीर में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और दस इन्द्रियों पर नियंत्रण पा जाता है फिर बाह्य जगत पर भी नियंत्रण करने की सामर्थ्य पा जाता है। सिद्ध साधक अपने शरीर को ही श्रीयन्त्र के रूप में भावित कर लेता है, जिससे शापानुग्रह शक्ति प्राप्त हो जाती है। ‘देहो देवालयः प्रोक्तो जीवोदेवः सनातनः’ की स्थिति प्राप्त हो जाती है।
यह महाचक्र श्री महात्रिपुर सुन्दरी का साक्षात विग्रह एवं पराशक्ति का अभिव्यक्ति का स्थान है। श्री यन्त्र के पूजन से चमत्कारिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं तथा समस्त आधियां-व्यधियां दूर होती हैं। शान्ति, पुष्टि, धन, आरोगय, मंत्र सिद्धि एवं मोक्ष प्राप्त होता है। विधिवत् प्राण प्रतिष्ठा किए हुए एवं प्रतिदिन पूजित श्री चक्र के दर्शन का फल महान है।

जिस प्रकार सभी कवचों में चण्डी कवच श्रेष्ठ है उसी प्रकार से सभी देवी-देवताओं के यन्त्रों मे श्री देवी का यन्त्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण इसे यन्त्रराज व यन्त्र शिरोमणि नाम से भी अभिहित किया गया है। दीपावली, धनतेरस, बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रांति के दिन यदि रविवार हो तो इस यन्त्र का निर्माण व पूजन विशेष फलदाई माना गया है।

प्रत्येक यन्त्र किसी न किसी यन्त्र का मूर्तरुप होता है और प्रत्येक मन्त्र किसी शक्ति विशेष (देवी-देवता) का सूक्ष्मतम (धवन्यात्मक) आकार है। इस प्रकार प्रत्येक यन्त्र किसी न किसी दैवी शक्ति (आलौकिक सत्ता)का प्रतीक है । साधना को सुगम बनाने और मानसिक एकाग्रता, तन्मयता तथा आत्म – समर्पण के लिए विभिन्न देवी-देवताओं की कल्पना कर की गई । इस प्रकार परम सता, अलौकिक शक्ति, ईश्नर, देवी, देवता और निराकार ब्रह्म यह सब वस्तुतः उसी अदृश्य शक्ति के नाम रुप है, जिसके नियन्त्रण में ही अखिल ब्रह्माण्ड का अणु-परमाणु परिचलित है।
श्री यन्त्र का स्म्बन्ध वैभव-सम्पदा की अधिष्ठात्री शक्ति से माना गया है। आधयात्मिक ग्रन्थों में इस शक्ति के विभिन्न नाम प्राप्त होते है। इसका सर्वसम्म्त नाम लक्ष्मी है। लक्ष्मी का पर्याय श्री है; अतः इस यन्त्र को ‘श्रीयन्त्र’ की संज्ञा प्रदान की गई है। वैसे भावसाम्य होने पर भी कहीं-कहीं नामांतर के प्रसंग भी मिलते है, यथा-तन्त्र शास्त्र के अन्तर्गत दस महाविद्याओं के क्रम में वर्णित तीसरी महाविद्या ‘षोडसी’ को श्री विद्या (लक्ष्मी) का स्वरूप माना गया है। महात्रिपुर सुन्दरी तथा ललिता जैसे नाम भी इस सन्दर्भ में प्राप्त होते हैं । जो भी हो, समृदि की स्वामिनी और प्रदायिका महादेवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त कराने के लिए उनकी पूजा, अर्चना, धयान तथा व्रत आदि उपासना के कई मन्त्र है। श्रीयन्त्र भी उन्ही में से एक है; पर प्रभाव, चमत्कार, अलौकिकता और स्थायित्व की दृष्टि के इसका सर्वोच्च है। श्रीयन्त्र साक्षात लक्ष्मी-प्रतिभा है। इसकी साधना निश्चित रुपेण कल्याणकारी होती है। अपनी इसी रहस्यमय शक्ति के कारण यह मन्त्र चिरप्राचीनकाल से सम्पत्ति प्रेमियों की लालसा का प्रमुख बिन्दु रहा है और बङे – बङे राजे-महाराजे तथा धनिक भी इसे प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहे है। जिसे यह यन्त्र मिल गया, वह श्री विद्या लक्ष्मी जी का कृपापात्र अवश्य हुआ। आज यह यन्त्र, जो कई शताब्दियों तक लुप्तप्राय था, अनेक धर्मों, सम्प्रदायों और देशों के धर्मप्राण जनों की आस्था अर्जित कर रहा है।
श्रीयन्त्र का निर्माण
आर्य ग्रन्थों में श्रीयन्त्र-निर्माण के लिए आधार भूमि की व्याख्या करत हुए कहा गया है कि इस यन्त्र की रचना के लिये स्वर्णपत्र, रजतपत्र, ताम्रपत्र अथवा भोजपत्र को आधारभूमि बनाना चाहिए । यद्यपि यन्त्र का प्रभाव अवश्य मिलता है; पर आधारभूमि के रुप मे वस्तुगत श्रेष्ठता के कारण प्रभावशक्ति में अन्तर अवश्य रहता है। भोजपत्र पर अंकित यन्त्र अपने मौलिक प्रभाव का दस गुणा, ताम्रपत्र पर अंकित यन्त्र सौ गुना, रजत यन्त्र पर अंकित यन्त्र सहस्त्र गुना और स्वर्णपत्र पर अंकित यन्त्र लाख गुना अधिक फल देने वाला होता है। इसके अतिरिक्त स्फटिक, विद्रुम (मुंगा) तथा पना जैसे रत्नों पर भी श्रीयन्त्र की र्चना होती है। पत्रों पर अंकित यन्त्र के अक्षर यदि ऊपर की ओर (उभरे हुये) हों, तो विशेष फलदायक होते है। उभरे अक्षरों के अभाव में, गहराई से उत्कीर्णित अक्षरों पर गोरोच्न, लाल चन्दन, केसर जैसी वस्तुयें, मन्त्र पढते हुए भर देना चाहिये। यदि रत्न पर यन्त्र बनवाना है, तो इस बात का धयान रखना चाहिए कि वह रत्न कम से कम एक तोले का अवश्य हो। वैसे 4 तोले भार के रत्न पर अच्छा यन्त्र बन सकता है। रत्नों पर निर्मित श्रीयन्त्र के गुणों का वर्णन सहज सम्भव नहीं। वह स्वयं लक्ष्मी के तुल्य प्रभावशाली होता है। पर रत्न की मूल्यवता को देखते हुए आज के युग में उसका निर्माण असम्भव जैसा हो गया है।
त्रिलोह धातु (सोना, चांदी, तांबा) के मिश्रण का पत्तत्र बनवाकर यदि उस पर यन्त्र रचना की जाय, तो वह श्री फलदायी होता है। जिसे कोई भी आधार सुलभ न हो, वह अन्तिम विकल्प के रुप में भूमि पर इस यन्त्र की रचना करने से पूर्व उस स्थान को भली-भांति स्वच्छ मिटटी से लीपकर शुद्ध करना आवश्यक है। तदुपरान्त यन्त्र पर लाल रंग की मिटटी बिछा देनी चाहिये। ईंट की सुर्खी इसके लिए उत्तम होती है। नदी की बालू यदि लाल रंग से रंग ली जाए तो वह भी प्रयोजनीय है। चावल भी (विभिन्न रंगों में रंगे) यन्त्र के कोष्ठकों में भरे जा सकते हैं । स्मरणीय है कि इस प्रकार की यन्त्र रचना में कलात्मकता के साथ उसकी पवित्रता, शुद्धि और स्वच्छता का भी पूरा धयान रखना चाहिऐ।

श्री यंत्र मंदिर: विश्व का प्रथम और अद्वितीय श्री यंत्र मंदिर कनखल , हरिद्वार मे बना हुआ है , नवरात्रो मे श्री यंत्र मंदिर मे जाकर पुजा करने का विशेष लाभ मिलता है । भगवती त्रिपुर सुंदरी की कृपा होती है ।
साधना की सरल विधि
शास्त्रवर्णित रुप में तो श्रीयन्त्र की साधना बहुत जटिल है, पर जनसामान्य के लिए विकल्प रुप में उसका सरलीकरण भी किया गया है। निम्नलिखित विधि से यदि श्रीयन्त्र की साधना की जाय तो निश्चित रुप से महालक्ष्मी की कृपा-प्राप्ति का अनुभव होता है। विघ्न- बाधाओं, आभावों का निवारण करके, सौम्य और समृद्धि देने मे यह यन्त्र विश्व का सर्वाधिक आशुफलदायक साधन प्रमाणित हुआ है।
सबसे पहले किसी शुभ मुहूर्त में यन्त्र की रचना करें । स्वयं न कर सके तो किसी दूसरे का सहयोग ले सकते है। तदुपरान्त किसी योग्य पण्डित के द्वारा उसकी प्राण- प्रतिष्ठा कराएं और विधिवत अपने पूजा घर में स्थापित कर दें । फिर दैनिक पूजा में अन्य देवी-देवताओं की भांति इस यन्त्र की भी पूजा करें । यदि आपके पास और कोई देव चित्र या प्रतिमा नही है, तो केवल इसी यन्त्र की आराधना करें। वस्तुतः यह स्वयं ही लक्ष्मी का साकार रुप होता है, अतः इसकी पूजा से लक्ष्मी साधना का पूर्णफल प्राप्त होता है।
पूजा के लिए स्नानोपरान्त स्वच्छ-शुद्ध वस्त्र धारण करें फिर यन्त्र के सम्मुख-आसन (कम्बल अथवा कुशासन) पर बैठक निम्नलिखित मन्त्र पढते हुए यन्त्र को प्रणाम करें-
दिव्या परां सुधवलारुण चक्रयातां,
मूलादि बिन्दु परिपूर्ण कलात्म रुपाम्॥
स्थित्यात्मिकां शरधुनु सृणि पाश हस्तां,
श्री चक्रतां परिणतां सततं नमामि ॥
श्री यन्त्र की अधिष्ठात्री देवी माहात्रिपुर सुन्दरी है। अतः यन्त्र को प्रणाम करने के बाद देवी के धयान हेतु निम्न श्लोक का पाठ करना चाहिए-
बालार्कायुत तैजसं त्रिनयनां रक्ताम्लरोल्लसिनीं,
नानालंकृति राजमानवपुषं बालेन्दु युक शेखराम्।
हस्तैरिक्षु धनु सृणिं सुरशरं पाशं मुद्रा निभ्रतीम,
श्री चक्रस्थति सुन्दरीम त्रिजगतामाधार भूतां भजे ॥
उक्त श्लोक द्वारा देवी का धयान करने के उपरान्त श्रीयन्त्र की पूजा करें। पूजा में पुष्प, अक्षत, धुप दीप तथा नेवैद्य अर्पित करना चाहिए । इसके पश्चात निचे लिखे हुए मन्त्र को 108 बार जपें। जप के लिए रुद्राक्ष, मुगां अथवा लाल चन्दन की माला उत्तम होती है।
मन्त्र
श्री यन्त्र की कृपाप्राप्ति के लिए इस मन्त्र का जप करना चाहिए । धयान रहे कि मन्त्र का उच्चारण बहुत ही शांत स्थिर चित से और शुद्धतापूर्वक किया जाय्। जप का स्थान स्वच्छ, एकांत, हवादार और पवित्र हो। गन्दगी, कोलाहत और विघ्नबाधा से बचने हेतु पहले ही सावधानी बरतना अच्छा रहता है। जो व्यक्ति इस मन्त्र का दैनिक जप करते हुए श्री यन्त्र का पूजन करता है-उसे भौतिक रुप से पर्याप्त समृद्धि तथा आधयात्मिक शान्ति प्राप्त होती है।

मन्त्र- ह्रीं क ए ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं,

मन्त्र पाठ में एक-एक अक्षर पर थोङा विराम देते हुए, अबाध गति से इसे पूर्ण करना चाहिए । जिस प्रकार वाक्य पढते समय प्रत्येक शब्द पर विराम रहता है, ठीक उसी भांति इसका उच्चारण होना चाहिए । इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर ‘ब्रीज’ है और वह अपने में बहुत व्यापक अर्थ समाहित किए हुए है।
108 बार जप पूरा ही जाने पर फिर से यन्त्र को प्रणाम करें और पूजा-समापन कर परिक्रमा करके अपने दैनिक कार्यों मे लग जायें।
स्वयं न बना सकने की स्थिति में हम से ताम्रपत्र रुप मे भी यन्त्र प्राप्त करके उसकी पूजा करने से यथेष्ट लाभ होता है। इसे देव प्रतिमा की भांति कहीं भी स्थापित करके पूजने से, समृद्धि प्राप्त होती है। श्री यन्त्र जहा भी रहता है, दुख दारिद्रय को दूर करके समृद्धि और सम्पन्न्ता का विस्तार रहता है। इसीलिए वह’यन्त्रराज’ कहा गया है|

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Category : Blog &जानकारी

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